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सबसे अहम रूस से दोस्ती!

अब यह साफ हो चुका है कि जब बात रूस की आए, तो भारत पश्चिमी देशों की भावना का ख्याल करने के बिल्कुल मूड में नहीं होता। बल्कि पश्चिमी देशों के प्रतिबंध से जो संकट खड़ा हुआ है, भारत उसका पूरा फायदा उठा रहा है। भारत सरकार की ये नीति देश में बड़ी संख्या में लोगों को रास भी आ रही है।

रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव भारत आ रहे हैँ। इस खबर को दुनिया भर में गहरी दिलचस्पी से देखा जाएगा। यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद रूस और भारत के बीच रिश्ते सारी दुनिया में चर्चित रहे हैँ। अब यह साफ हो चुका है कि जब बात रूस की आए, तो भारत पश्चिमी देशों की भावना का ख्याल करने के बिल्कुल मूड में नहीं होता। बल्कि पश्चिमी देशों के प्रतिबंध से जो संकट खड़ा हुआ है, भारत उसका पूरा फायदा उठा रहा है। खास बात यह है कि भारत सरकार की ये नीति देश में बड़ी संख्या में लोगों को रास आ रही है।

गौरतलब है कि पश्चिमी देश लगातार भारत को रूस के प्रति अपना रुख कड़ा करने की अपील कर रहे हैं। लेकिन भारत सरकार का रुख है कि वह अपने हितों को प्राथमिकता देना जारी रखेगी। तो पहले रक्षा सौदों पर बात हुई, फिर सस्ते दामों पर रूसी तेल खरीदने पर, और अब कोयले की खरीदारी बढ़ाने पर चर्चा चल रही है। केंद्रीय इस्पात मंत्री रामचंद्र प्रसाद सिंह ने दो टूक कहा- हम रूस से कोकिंग कोयला आयात करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। भारत पहले से ही रूस से इसे आयात करता रहा है।

अब भारत ने रूसी कोकिंग कोयले के आयात को दोगुना करने की योजना बनाई है। एक कंसल्टेंसी कंपनी र के अनुसार इस महीने कम से कम 10 लाख टन कोकिंग कोयला और थर्मल कोयला समुद्र के रास्ते भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचा दिया जाएगा। इतनी बड़ी मात्रा में रूसी कोयला जनवरी 2020 के बाद भारत में नहीं आया। कोकिंग कोयले का इस्तेमाल मुख्य रूप से स्टील बनाने में किया जाता है और थर्मल कोयले का बिजली बनाने के लिए। रूस भारत के लिए इन दोनों का छठा सबसे बड़ा सप्लायर है।

व्यापारियों का कहना है कि प्रतिबंधों की वजह से यूरोपीय और दूसरे ग्राहकों ने रूस से दूरी बना ली है। ऐसे में रूस चीनी और भारतीय ग्राहकों को और सस्ते दामों की पेशकश कर सकता है। रुपये-रूबल व्यापार के इस्तेमाल से इस व्यापार को और मजबूत भी किया जा सकता है। कई मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि भारत सरकार रुपये-रूबल व्यापार को फिर से शुरू करने पर विचार कर रही है। इसे वैश्विक कारोबार में डॉलर के वर्चस्व के लिए तगड़ा झटका माना गया है।

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