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आम नागरिकों को कब सुलभ होंगे मानवाधिकार।

विकास कुमार

प्रत्येक वर्ष 10 दिसंबर को विश्व मानवाधिकार दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह पहल संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 10 दिसंबर ,1948 से की गयी थी। 1939 से 1945 द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात वैश्विक राजनीति के चिंतकों एवं विचार को ने मानवीय गरिमा एवं मनुष्य के मूलभूत अधिकारों से ओतप्रोत होकर इस नवाचार की पहल को संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धांतों एवं उद्देश्य में लागू किया। तत्पश्चात सदस्य देशों को भी निर्देशित किया गया की वह अपने देश में मानवाधिकार से संबंधित आयोग कि स्थापना करें जो देश में रहने वाले नागरिकों के मूलभूत अधिकारों की रक्षा कर सकें जिनको सरकारें और शासन नकार देती हैं एवं अनदेखा कर देती हैं। भारत में भी इस अनुक्रम को अपनाते हुए 1993 में मानवाधिकार आयोग की स्थापना की गई जिसका कार्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है। यह एक यात्रा का परिणाम है सर्वप्रथम 1215 में ब्रिटेन में मैग्नाकार्टा के रूप में नागरिकों के कुछ अधिकारों को सुनिश्चित किया गया था।

यही पहल अमेरिका के स्वतंत्रता की घोषणा पत्र 1776 में मानव गरिमा को प्रमुख मानते हुए अधिकारों को सक्रियता प्रदान की गई थी। यही कारण रहा कि अमेरिका जैसे विकसित देश ने संविधान अपनाते समय मौलिक अधिकारों का समायोजन एवं संकलन अपने संविधान में किया। 1789 की फ्रांसीसी क्रांति स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुत्व के नारे पर हुई थी जिन में मानवाधिकारों के मूलभूत प्रावधान देखने को मिलते हैं। 1946 में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया एवं 1948 में सार्वभौमिक रूप से मानव अधिकार दिवस की घोषणा की गई। इन्हीं आयामों से संबंधित 1949 में जिलों में संधि हुई तथा 1950 में मानव अधिकार तथा मौलिक स्वतंत्रता ओं के संरक्षण हेतु यूरोपीय संधि हुई। इसी प्रक्रिया में 1961 में यूरोपीय सामाजिक घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर की हुई तथा 1966 में आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों की अंतरराष्ट्रीय संधि ,नागरिक एवं राजनैतिक अधिकारों की अंतरराष्ट्रीय संधि, नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों से जुड़ी ऐच्छिक संधि का प्रावधान किया गया।

इस प्रकार से आधुनिक समय में मानव अधिकारों का विकास हुआ। भारत में 1993 के अधिनियम के द्वारा राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग एवं राज्य के मानव अधिकार आयोग से संबंधित प्रावधान किए गए। मानव अधिकार आयोग के धारा 2(1) स्र में प्रावधान मिलता है कि जो मानव गरिमा एवं मानव सम्मान को प्रबलता प्रदान करते हैं ऐसे अधिकारों को मानव अधिकार की श्रेणी में रखा जाएगा। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी कई मामलों में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 एवं भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 को मानवाधिकार से संबंधित बताया है। संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन के अधिकार से संबंधित है जिसमें जीवन से संबंधित इन मूलभूत अन्य अधिकारों की भी वृहद एवं विस्तृत चर्चा की गई है। कई अन्य मामलों की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कई प्रकार की श्रेणियों के अधिकारों को अनुच्छेद 21 में सम्मिलित करने का निर्देश देते रहे हैं। आज विश्व सार्वभौमिक रूप से मानव अधिकारों की अवधारणा को अपना चुका है।

यह कहना बिल्कुल सत्य है कि इस अवधारणा को अपनाने के पश्चात मनुष्य में मानव अधिकारों के प्रति जागरूकता एवं उनके अधिकार कुछ हद तक सुरक्षित एवं संरक्षित हुए हैं परंतु जिस संरचना के संरक्षण के तहत इनकी परिकल्पना की गई थी क्या वह आज साकार होते दिख रहे हैं? यह समाज और शासन दोनों के समक्ष एक बड़ा प्रश्न है? जिसको ना अकादमिक जगत के लोग, नाही न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े लोग और स्वयं मानव अधिकारों के सक्रिय लोग भी इसको नकार नहीं सकते। सामान्य तौर पर शिक्षित नागरिकों के भी अधिकार सुरक्षित होते नहीं दिखाई दे रहे हैं कई प्रकार के मानवाधिकारों से मेल न खाने वाली गतिविधियों का प्रयोजन बता कर उनके अधिकारों को ठेस पहुंचाई जाती है। यहां पर एक पक्ष लेना उचित नहीं होगा। यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि कई संगठन और राजनेताओं का जत्था मानवाधिकारों की दुहाई देकर प्रशासन की गरिमा को भी ठेस पहुंचाते हैं। परंतु यह अल्प संख्या में होता है।

गरीब लोगों को नाही कानून की जानकारी होती है और ना ही मानवाधिकारों की। छोटे से छोटे काम के लिए उनसे व्यापक रूप से रिश्वत ली जाती है। फुटपाथ पर सोने वाले बिहारी मजदूरों से वसूली की जाती है। रिक्शा चलाने वाले दैनिक रूप से दो से ?300 कमाने वाले असंगठित मजदूर से छोटे से कानून के उल्लंघन पर पैसा लिया जाता है। किसानों के क्रेडिट कार्ड बनवाने एवं सरकारी योजनाओं से लाभान्वित प्रक्रिया में पहले से ही परसेंटेज तय कर दिया जाता है। आवास एवं सरकारों द्वारा संचालित आवंटित राशन में कई तकनीकी समस्याओं का हवाला देकर परेशान किया जाता है। सरकारी अस्पतालों में अच्छी दवा लेने के लिए डॉक्टर को अलग से पैसा देना होता है। एक ग्लोबल सूचकांक के अनुसार एवं यूएनडीपी के रिपोर्ट के अनुसार 27 फ़ीसद से अधिक भारत की जनसंख्या मूलभूत प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य से वंचित है। आज भ्रष्टाचार का स्तर बढ़ता जा रहा है, लोकतांत्रिक शासन प्रक्रिया में आम नागरिकों को महत्वहीन समझा जा रहा है। केवल मतदान के समय ही उसका महत्व समझा जाता है। कई प्रकार के प्रोटोकॉल और कानूनों को केवल आम नागरिकों पर ही लागू किया जाता है।

आज तक किसी सामंत, बड़े घराने, राजनेताओं एवं पूंजी पतियों को किसी भी प्रकार की गतिविधियों में लाइन में खड़े होते हुए नहीं देखा गया है। जब तक मानव अधिकारों का प्रावधान आम जनमानस को नहीं मिलेगा तब तक तब तक मानव अधिकारों का श्रेष्ठ उद्देश्य साकार नहीं होगा। क्योंकि यह अधिकार संपूर्ण मानव के विकास के लिए एवं मानवता के रक्षा के लिए निर्धारित किए गए हैं। यदि किसी वर्ग विशेष को इससे वंचित रखा जाएगा तो इनका सिद्धांत और सपना अधूरा रह जाएगा। संस्थाओं और सरकारों को चाहिए कि मानव अधिकारों से संबंधित गतिविधियों को कानून पर आधारित प्रक्रिया के माध्यम से संचालित करें। जिससे विधि का शासन सुनिश्चित होगा और लोकतंत्र अधिक मजबूत बन सकेगा। 1992 के पश्चात नागरिक समाज कि अधिक सक्रियता और गतिविधियों को सुनिश्चित करने के लिए सुशासन की अवधारणा लोकतंत्र में सुनिश्चित हुई जिसमें मानवाधिकार से संबंधित संरक्षण का प्रावधान एक अहम मूल्य है।

क्योंकि मानवाधिकारों का मूल्यांकन शासन की जवाबदेही, उत्तरदाई, विधि के शासन, संविधानवाद, एवं मानव गरिमा को सुदृढ़ता प्रदान करने के लिए किया जाता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि मानव अधिकारों का लाभ संपूर्ण मानव समुदाय को मिले। इसके प्रति सभी जागरूक हूं। तभी वास्तविकता मानवाधिकारों के उद्देश्यों का सपना साकार हो सकेगा।
( लेखक- केंद्रीय विश्वविद्यालय अमरकंटक में रिसर्च स्कॉलर हैं एवं राजनीति विज्ञान में गोल्ड मेडलिस्ट है।)

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